ज़ीनत अमान का भोपाल के राज घराने से है गहरा तालूख

ज़ीनत अमान का भोपाल के राज घराने से है गहरा तालूख...!!

WRITTEN BY Ved Kumar | Updated: March 18, 2024, 12:30 PM IST

19 नवम्बर 1951 को जन्मी ज़ीनत अमान को बॉलीवुड की उस हीरोइन के रूप में याद किया जाता है    एक मुस्लिम पिता, अमानुल्लाह खान और एक महाराष्ट्रीयन हिंदू मां, वर्धिनी शारवाचर के घर जन्मी,  जीनत अमान, अभिनेता रज़ा मुराद की चचेरी बहन और अभिनेता मुराद की भतीजी हैं जिसने नायिकाओं की परिभाषा को बदल कर रख दिया। ज़ीनत ने जब फिल्मों में कदम रखा तब ज्यादातर हीरोइनें इंडियन लुक में नजर आती थीं, लेकिन ज़ीनत ने वेस्टर्न लुक में अपने आपको पेश कर धमाका कर दिया।बोल्डनेस को भी ज़ीनत अमान ने नई परिभाषा दी। कैमरे के सामने हिचक तोड़ वे बिंदास तरीके से पेश आईं और यही कारण है कि उनके फैंस ने सेक्स सिम्बल खिताब से ज़ीनत को नवाजा।ज़ीनत के पिता अमानुल्लाह खान स्क्रिप्ट राइट थे और बतौर सहायक उन्होंने 'मुगल-ए-आज़म' और 'पाकीज़ा' जैसी फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी। वे अमान नाम से लिखते थे।

ज़ीनत जब 13 वर्ष की थीं तब उनके पिता गुजर गए तो ज़ीनत ने अपने नाम में पिता का नाम जोड़ लिया और वे ज़ीनत खान से ज़ीनत अमान बन गईं। ज़ीनत की मां ने हैंज़ नामक जर्मन पुरुष से दूसरी शादी कर ली और वे अपने साथ ज़ीनत को भी जर्मनी ले गईं। वहां से वे लॉस एंजिल्स पढ़ाई करने गईं, लेकिन 18 वर्ष की होने पर पढ़ाई अधूरी छोड़ ज़ीनत भारत में करियर बनाने के लिए आईं। फिल्म अभिनेता रज़ा मुराद की ज़ीनत कज़न हैं। 

ज़ीनत ने बतौर पत्रकार 'फेमिना' में काम किया और बाद में वे मॉडलिंग की तरफ मुड़ी। ताज महल चाय के लिए उन्होंने मॉडलिंग की। ज़ीनत को ओपी रल्हन ने फिल्मों में पहली बार अवसर दिया। 'हलचल' (1971) उनकी पहली फिल्म है।हलचल और हंगामा (1971) के पिटने के बाद ज़ीनत ने जर्मनी अपनी मां के पास लौटने का निश्चय कर लिया, लेकिन इसी बीच उन्हें बॉलीवुड के सुपरस्टार देव आनंद ने 'हरे रामा हरे कृष्णा' ऑफर की जो 1971 में ही रिलीज हुई। हरे रामा हरे कृष्णा में ज़ीनत ने अपने आपको वेस्टर्न स्टाइल को इस तरह पेश किया कि वे करोड़ों दर्शकों के दिल की धड़कन बन गईं। उन पर फिल्माया गया गीत 'दम मारो दम' आज भी युवाओं को पसंद आता है। ज़ीनत अमान को देव आनंद बेहद पसंद करते थे। ज़ीनत के साथ उन्होंने हीरा पन्ना, इश्क इश्क इश्क, प्रेम शास्त्र, वारंट, डार्लिंग डार्लिंग और कलाबाज जैसी फिल्में की। बरसों बाद देव आनंद ने स्वीकारा था कि वे ज़ीनत अमान को चाहने लगे थे।यादों की बारात (1973) की सफलता के बाद ज़ीनत अमान स्टार बन गईं। इस फिल्म में 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' गीत ज़ीनत पर फिल्माया गया और वे युवाओं के दिल की धड़कन बन गईं।ज़ीनत अमान को कभी अच्छी अभिनेत्री नहीं माना गया, इसके बावजूद उन्होंने उस दौर के नामी फिल्म मेकर, देव आनंद, राज कपूर, बीआर चोपड़ा, फिरोज़ खान, प्रकाश मेहरा, मनोज कुमार, मनमोहन देसाई, राज खोसला के साथ काम किया। 1978 में ज़ीनत की दो बड़ी फिल्म सत्यम शिवम सुन्दरम और शालीमार फ्लॉप रही जिससे ज़ीनत के करियर पर प्रश्न चिन्ह लग गया, लेकिन ज़ीनत ने सफल वापसी की। सत्यम शिवम सुन्दरम को राज कपूर ने निर्देशित किया जिनके साथ फिल्म करना हर हीरोइन का ख्वाब होता है। ज़ीनत ने इस फिल्म में जम कर अंग प्रदर्शन किया और उन्हें कुरूप स्त्री के रूप में फिल्म में पेश किया गया। फिल्म के प्रदर्शित होने के बाद ज़ीनत की जम कर आलोचना हुई, लेकिन बाद में उन्हें इस फिल्म के जरिये ख्याति भी मिली। 

ज़ीनत ने अपने दौर के नामी स्टार्स अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, जीतेन्द्र, देव आनंद, राजेश खन्ना के साथ फिल्में की। 

ज़ीनत अमान ने 1985 में मज़हर खान से विवाह कर कई पुरुषों का दिल तोड़ दिया। 1998 में मज़हर की मृत्यु हो गई। अज़ान और ज़हान नामक उनके दो बेटे हैं। ज़ीनत की फिरोज़ खान, इमरान खान, कंवलजीत और संजय खान से भी नजदीकियों के चर्चे रहे। कहा जाता है कि संजय से भी उन्होंने विवाह रचाया था, जो कुछ दिनों तक ही टिक सका। दोनों के बीच एक पार्टी में मारपीट की खबरों ने भी सुर्खियां बटोरी।

1985 में अभिनेता मज़हर खान से शादी के बाद , अमन ने फिल्मों में कम दिखाई देना शुरू कर दिया और 1989 में एक अंतराल ले लिया, उस अवधि के लिए उनकी आखिरी फिल्म गवाही (1989) थी। 1999 में, अमन ने फिल्म भोपाल एक्सप्रेस के साथ वापसी की । इसके बाद, उन्होंने 2003 तक अभिनय फिर से शुरू नहीं किया, जब वह फिल्म बूम में दिखाई दीं । उसके बाद से उन्होंने विभिन्न स्वतंत्र फिल्मों में भूमिकाएँ निभाई हैं, जिनमें अग्ली और पगली (2008), पता नहीं... ना जाने क्यों (2010), चौराहें (2012), स्ट्रिंग्स ऑफ़ पैशन (2014), पता नहीं... लाइफ इज़ ए मोमेंट (2015), दिल तो दीवाना है (2016), और सल्लू की शादी (2017) शामिल हैं।

अमानुल्लाह  की मां , याने ज़ीनत अमान की दादी   "अख्तर जहां बेगम" भोपाल के अंतिम नवाब हमीदुल्लाह खान की चचेरी बहन थीं।

अमानुल्लाह याने जीनत अमान के पिता के बारे मे जानकार बताते है कि एक्ट्रेस मीना कुमारी का उन्होंने हलाला किया था।फिल्मी जानकर बताते है कि मीना कुमारी का जब कमाल अमरोही से तलाख हुआ तो उसके बाद उनका दोबारा सुलह हुआ तो हलाला करने के लिए कमाल अमरोही ने अमानुल्लाह से मीना कुमारी की शादी करवाई ,फिर अमानुल्लाह ने सुहागरात मनाई और फिर तलाख दिया।

 भोपाल रियासत की बात की जाए तो भोपाल मे मुस्लिम राजाओं का ब्रिटिश काल मे काफी दबदबा रहा है , लेकिन यहा के मुस्लिम राजा खुद को राजा की जगह "नवाब" टाइटल से सम्बोधित कराना  ज्यादा पसंद करते थे।ठीक ऐसा ही चलन लखनऊ मे भी है लखनऊ मे भी वहा के पुराने मुस्लिम राजा , नवाब टाइटल का उपयोग करते थे। 

  नवाब हमीदुल्लाह  के बारे मे   कुछ रोचक तथ्य :-

नवाब हमीदुल्लाह खान के बारे मे कहा जाता है कि उनकी ताजपोशी करीब 1926 मे हुई थी। याने सरल शब्दों मे कहे तो 1926 मे भोपाल रियासत के राजा बन गये थे। नवाब हमीदुल्लाह खान ,मोहम्मद जिन्ना और लार्ड माउंटबैटन के काफी करीबी माने जाते थे।वो भोपाल रियासत को अखंड स्वंतंत्र भारत मे नहीं मिलाना चाहते थे लेकिन मोहम्मद जिन्ना की समझाईश पर वो मान गये और 1951 मे भोपाल रियासत अखंड स्वतंत्र भारत का हिस्सा बना ।

नवाब हमीदुल्लाह खान की बात की जाए तो इनकी तीन बेटियां थी । सबसे बड़ी बेटी का नाम था आबिदा सुल्तान ,दूसरे नंबर की बेटी का नाम था साजिदा सुल्तान और तीसरे नंबर की बेटी का नाम था राबिया सुल्तान ,सबसे बड़ी बेटी का विवाह कुरवाई स्टेट(MP)  के नवाब /राजा से हुआ था ।  इनकी शादी इंडिया पाकिस्तान पार्टिशन होने के कई  साल पहले ही हो गई थी, पर ये पार्टिशन के बाद हस्बैंड के साथ कराची (पाकिस्तान ) मे शिफ्ट हो गयी।और वहा नये नये बने पाकिस्तान मे वहा की फॉरेन मिनिस्टर बन गई। और इसी वजह से हामिदुल्लाह की दूसरी बेटी साजिदा सुल्तान को राजा गद्दी सोपी गयी। आगे चलकर आबिदा बेगम एक बेटे ( शहरयान खान) की मा बनती है । शहरयार मुहम्मद खान का जन्म 29 मार्च 1934 को भोपाल स्टेट के कसर-ए-सुल्तानी पैलेस (अब सैफिया कॉलेज) में हुआ था।  बड़ा होकर ये बेटा पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) का चेयरमैन बनता है। हाल ही मे मार्च 2024 मे इनका निधन हुआ है। ज्ञात हो कि ये पाकिस्तान मे फॉरेन सेक्रेटरी के पद  पर भी रह चुके है,इन्होने शशि थरूर के साथ मिलकर एक नॉवेल भी लिखा था। आपको बता दे कि हामिदुल्लाह साहब भी क्रिकेट के बड़े शौकीन थे और ये ब्रिटिश काल मे BCCI  के चैयरमैन हुआ करते थे। 

एक्टर सैफ अली के दादाजी (इफ्तिकार ) और भोपाल की राजकुमारी ( साजिदा बेगम) का वैवाहिक समोरोह का दृश्य

साजिदा सुल्तान की जब इफ्तिकार पाटोदी से जब शादी होती है तो इफ्तिकार पाटोदी साहब ही एक तरह से भोपाल रियासत के राजा बन जाते है।आप सभी को ज्ञात हो कि  इफ्तिकार पाटोदी हरियाणा स्टेट से आते है।  इफ्तिकार पाटोदी और साजिदा बेगम का बेटा होता है जिनको हम क्रिकेटर नवाब पाटोदी या मंसूर अली पाटोदी नाम से जानते है ये मंसूर अली पाटोदी सैफ अली के पिताजी थे। तो इस बात से साधारण निष्कर्ष ये निकालता है कि भोपाल मे जितनी भी प्रॉपर्टी आज सैफ अली खान के पास है वो सभी उनके पिताजी की नानी जी की प्रॉपर्टी है। आप सभी को ज्ञात हो कि भोपाल रियासत मे जो भी रानी बनती थी उनको "नवाब बेगम " टाइटल दिया जाता था। भोपाल रियासत की खास बात ये रही है कि यहा के जो नवाब रहे है उनका ज्यादा ऐडमिनिस्ट्रेटिव पकड़ देखने कम मिलता है। ज्यादातर केस मे भोपाल  रियासत की प्रॉपर्टी को मैनेज और मेन्टेन करने मे नवाब बेगमे /रानिया ही आगे रही है। इसलिए सैफ अली भी अक्सर कहते रहते है कि उनका भोपाल की प्रॉपर्टी की देख रेख उनकी माँ  शर्मीला टैगोर ही  करती है क्युकी उनको नवाब बेगम का टाइटल मिला हुआ है।

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